Friday 9 December 2016

Think about a life,
Which doesn't have a life,
And always looking for life badly,

And if luckily, incidentally, fortunately, willingly,
Happen to see somewhere a life,
And tries everyhow to get that life,

Forcibly, unfortunately, accidentally, deliberately,
The life doesn't allow to go to that life,
And life remains empty of life,

Then the life sitting in dark,
Emotionally, innocently, silently, hurtly,
Thinking about questioning the life,
That where is life in this life,

And the life answers instantly,
Go get your life,
And take along your life,
And make a life full of life,

But there come situations,
Suddenly, accidentally, quietly, stubbornly,
And burn the bridge going to life,

And life remains a life,
Which doesn't have a life.

- VishVaas

Friday 23 December 2011

Halla Bol

उठें युवजन उठें, उठकर कड़क सवाल करें
न मांगे से मिले उत्तर, तो उठकर बवाल करें
हर बरस अन्न से जब देश के भण्डार भरते हैं
भूख से किसलिए फिर भी हमारे बंधु मरते हैं
वजह बतलाएं सत्ताधीश क्यूँ बदहाल खेती है
खुदखुशी अन्नदाता की क्यूँ नहीं दर्द देती है
गगनचुम्बी इमारत शहर की किसको न भाएगी
मगर ये झुग्गियां कब तक तरक्की को चिडाएगी
दशक छह बीतने पर भी है जिस से दूर आज़ादी
रहेगी मौन कब तक देश की ये आधी आबादी
करोड़ों घर अभी तक पानी, सड़क, बिजली से वंचित हैं
उधर, खरबों रुपये चंद स्विस खातों में संचित हैं

उनके सर आज सवालों की ये बौछार पड़े
हम ये माहौल बदलने को लड़े और अड़े

ये क्या शिक्षा है जो न हमको रोज़गार देती है
न अपने देश-भाषा-भेष का संस्कार देती है
हमारे गुरुकुलों में नहीं अब चाणक्य से गुरुवर
वो जो की चन्द्रगुप्तों को घिसें, दें तीक्ष्णतम तेवर
करोड़ों साक्षरों को फ़ौज हाँ बेकार फिरती है
इन्ही में से कई टोली डगर घातक पकडती हैं
कोई जाकर गली कूचों में विष की बेल बोता है
कोई ले दुश्मनों से अन्न-धन ईमान खोता है
हैं जिनके लब पे नक्सलवाद या जेहाद के नारे
थे खाली हाथ, जो शैतान बन बैठे हैं बेचारे
कहाँ किन गफलतों में नीति निर्माता हमारे हैं
छोड़ कर कश्ती दरिया में वो जा बैठे किनारे हैं

नई पीढ़ी चढ़े बदलाव के शिखरों पे चढ़ें
हम ये माहौल बदलने को लड़ें और अड़े

- वीरेन्दर सिंह चौहान

Tuesday 23 August 2011

kranti

हो चुकी है  पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

Thursday 9 June 2011

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है;
मगर धरती की बैचैनी को बस बादल समझता है.
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है;
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है.

मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है;
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है.
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसू हैं,
जो तू समझे तो मोती हैं जो ना समझे तो पानी है.

समंदर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता,
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता.
मेरी चाहत को अपना तू बना लेना मगर सुनले 
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

भंवर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हँगामा,
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हँगामा.
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हँगामा.

                                                  -कविराज कुमार विश्वास

Wednesday 23 March 2011

VishVaas


ना मिला तेरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे,
यूँ ही दर बदर रहा तो मुझे लोग क्या कहेंगे!

मैं चला तो हूँ सुनाने उसे दास्ताँ वफ़ा की,
कोई हादसा हुआ तो मुझे लोग क्या कहेंगे!

ये जहाँ ना जाने क्या क्या मुझे कह रहा है लेकिन,
कभी तुमने कुछ कहा तो मुझे लोग क्या कहेंगे!

यूँ ही नहीं हो आये तुम ज़िन्दगी में मेरी,
कुछ तो असर रहा होगा बन्दगी में मेरी!

ज़िन्दगी के मरहले आसान होते जायेंगे,
आप इस दिल के अगर मेहमान होते जायेंगे!

इश्क की राहों में गुजरेंगे हजारों हादसे,
हार के वो जीत के मेहमान होते जायेंगे!

जीत लूँगा मैं जहाँ की मुश्किलों को एक दिन,
राह के पत्थर सभी इंसान होते जायेंगे!

हौसले मेरे जहाँ में देखने की चीज़ है,
देखने वाले सभी हैरान होते जायेंगे!

आप इस दिल के अगर मेहमान होते जायेंगे!
                                                       -सतीश पंडित