Friday 23 December 2011

Halla Bol

उठें युवजन उठें, उठकर कड़क सवाल करें
न मांगे से मिले उत्तर, तो उठकर बवाल करें
हर बरस अन्न से जब देश के भण्डार भरते हैं
भूख से किसलिए फिर भी हमारे बंधु मरते हैं
वजह बतलाएं सत्ताधीश क्यूँ बदहाल खेती है
खुदखुशी अन्नदाता की क्यूँ नहीं दर्द देती है
गगनचुम्बी इमारत शहर की किसको न भाएगी
मगर ये झुग्गियां कब तक तरक्की को चिडाएगी
दशक छह बीतने पर भी है जिस से दूर आज़ादी
रहेगी मौन कब तक देश की ये आधी आबादी
करोड़ों घर अभी तक पानी, सड़क, बिजली से वंचित हैं
उधर, खरबों रुपये चंद स्विस खातों में संचित हैं

उनके सर आज सवालों की ये बौछार पड़े
हम ये माहौल बदलने को लड़े और अड़े

ये क्या शिक्षा है जो न हमको रोज़गार देती है
न अपने देश-भाषा-भेष का संस्कार देती है
हमारे गुरुकुलों में नहीं अब चाणक्य से गुरुवर
वो जो की चन्द्रगुप्तों को घिसें, दें तीक्ष्णतम तेवर
करोड़ों साक्षरों को फ़ौज हाँ बेकार फिरती है
इन्ही में से कई टोली डगर घातक पकडती हैं
कोई जाकर गली कूचों में विष की बेल बोता है
कोई ले दुश्मनों से अन्न-धन ईमान खोता है
हैं जिनके लब पे नक्सलवाद या जेहाद के नारे
थे खाली हाथ, जो शैतान बन बैठे हैं बेचारे
कहाँ किन गफलतों में नीति निर्माता हमारे हैं
छोड़ कर कश्ती दरिया में वो जा बैठे किनारे हैं

नई पीढ़ी चढ़े बदलाव के शिखरों पे चढ़ें
हम ये माहौल बदलने को लड़ें और अड़े

- वीरेन्दर सिंह चौहान